Monday, 11 October 2010

सईद ख़ा ’सईद’

















हज़रात, पेश-ए-ख़िदमत है
जनाब ’सईद अहमद सईद’
की एक ग़ज़ल
 मुलाहिज़ा फ़रमाएं-

मैं चाहता हूं मगर बाख़ुदा नहीं होती
किसी की याद है दिल से जुदा नहीं होती

न लाओ लफ़्ज़े-तआस्सुब को कभी दिल के क़रीब
मरज़ ये ऐसा है जिसकी दवा नहीं होती
 
वही हूं मैं वही तू है, वही हैं हाथ मेरे
कबूल क्यों मेरी या रब दुआ नहीं होती

ज़मीर वाले तवक्कल ख़ुदा पे रखते हैं
ख़ुदी न बेच, ये दौलत ख़ुदा नहीं होती

सईद अपनी दुआओं में इल्तजा रखना
दरे-हबीब पे ख़ाली सदा नहीं होती

Sunday, 19 September 2010

अ. सलाम फ़रीदी

हज़रात, आदाब
हाज़िर है 
जनाब अ. सलाम फ़रीदी की गज़ल

वो अक़्ल वो शऊर न दे, ऐ ख़ुदा मुझे
ख़ुद से हक़ीर लगने लगे दूसरा मुझे

फिर मेरी चश्मे-शौक़ की ताक़त को आज़मा
ऐ बरक़े-तूर फिर वही जलवा दिखा मुझे

इंसान जिसमें देख ले खुद अपनी असलियत
मिलता नहीं है ऐसा कोई आईना मुझे


मेरी शिकस्त का यही नासेह बना सबब
दुश्मन से मिलके दोस्त ने दी है दग़ा मुझे

मैं ज़िन्दगी के कर्ब से घबराया जब कभी
 यादों ने तेरी बढ़के सहारा दिया मुझे

ममनून यूं फ़रीदी मैं अपनी अना का हूं
हर वक़्त देती रहती है दर्शे-ग़िना मुझे

Monday, 16 August 2010

याक़ूब मोहसिन

साहेबान आदाब
पेश है शम-ए-अदब
इसमें आसपास मौजूद साथी शायरों का कलाम पेश किया जायेगा.
शुरूआत











जनाब  या़क़ूब मोहसिन
की  इस ग़ज़ल से
मुलाहिज़ा फ़रमाएं

हम कैसे बहादुर हैं दुनिया को दिखाना है
दुश्मन जो वतन के हैं उन सबको मिटाना है

वो लाख करे कोशिश इक इंच नहीं देंगे
सरहद से बहुत आगे दुश्मन को भगाना है

जो तोप के गोलों से बिल्कुल भी नहीं सहमे
उन वीरों की हिम्मत का कायल ये ज़माना है

इतरा के न चल इतना मग़रूर न बन इतना
दो ग़ज़ की ज़मीं है वो जो तेरा ठिकाना है

तुम मिलके बिछड़ने का अहसास न कर लेना
हमको तो शहादत का ये शौक पुराना है

हिम्मत से हर इक मुश्किल आसान हुई मोहसिन
दुश्मन को मिटाने का बस अज़्म बनाना है

शायर: याक़ूब मोहसिन